है ज़िंदगी पुकारती !

 


बगीचे की सुगंध वो कली गुलाब की हरे भरे पौधे और चमक प्रकाश की सुबह सुबह की शांति चिड़ियाँ गुनगुनाती उठ जा मोहन प्यारे तुझे है ज़िंदगी पुकारती ! छोड़ कल की कहानी अब हो चुकी पुरानी तू बन आज का सितारा कर रोशन ज़माना तू मंज़िल की पुकार सुन खुद राह अपनी आज चुन अन्दाज़ बदल के वो पुराना लिख आज कोई नया तराना ठोकरों से मत घबरा सीख जो ये पाठ सिखातीं ठहरा पानी मत बन तू उड़ जैसे हवा सनसनाती उठ जा मोहन प्यारे तुझे है ज़िंदगी पुकारती ! टूटता है बार बार पर नहीं मानती वो हार मकड़ी अपने हौसले से दोबारा बुनती है नया जाल माना तेरी कोशिश कमाल थी मेहनत भी थी बेमिसाल बिना थके आज फिर खुद को तू उस मकड़ी जैसा ढाल थक के हार जाना तेरा काम नहीं माना चलते रहना भी आसान नहीं हर दिन राहें नया मोड़ दिखाती हर क्षण तुझे कुछ नया सिखातीं उठ जा मोहन प्यारे तुझे है ज़िंदगी पुकारती ! त्याग अब आलस को तू ख़्वाबों को तू ना भुला उम्मीद रख और बढ़ते बढ़ते मन में अपने उमंग जगा डरता क्यूँ परिणाम से तू कर्तव्य पथ पर चलता जा आँख लक्ष्य पर अर्जुन जैसे चला तीर और हुनर दिखा दुनिया तुझको नाम से जाने मेहनत ही ये कमाल दिखाती प्रगति होगी तेरी अपने ही कर्म से तुझको वो इस क़ाबिल बनाती अब तू उठ जा मोहन प्यारे तुझे है ज़िंदगी पुकारती !!

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~ shubh 🐰



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