क्यों है ख़ामोश ?


आज मन ने, अपने मन में, मन ही मन सोचा, कि अगर मन में नहीं, कोई शक, कोई संदेह, कोई संकोच, कोई भय, तो फिर ये खामोशी कैसी ? क्या मन नहीं जानता, अपने मन के हालात, क्यों है अनजान आज, हर मन, अपने मन के भाव से? क्यों हैं इंसान आज, ख़फ़ा उस भगवान से ? क्यों है नफ़रत इतनी , इंसान की इंसान से ? क्या उसके मन में है? क्या ये उसका मन नहीं जानता? माना कि मन को, समझाना है मुश्किल, पर, क्या मन का, मन में ही रह जाना है ठीक? जब मन ना माने, तो मनाते हैं हम, लेकिन मन की हर बात, छुपाते हैं हम, यूँ मन का मन में, अपने मन से, ख़फ़ा रहना, मन ही मन सब सहते रहना, आख़िर कब तक सही है ?? किसको पता, क्या मन को है भाता ? क्यों है इतना ये विचलित आज ? क्या है चाहता ? किसकी है तलाश ? क्यों है परेशान ? किससे है आस ? अपने मन को ना मार तू इंसान, क्यूँकि, मन को मारना मतलब खुद से तकरार, तू मत घबरा, आज होने दे इजहार, मन की गहरायी में जा, और सुन मन की पुकार, मन की हलचल बुन, कभी मन को समझा, और कभी मन की सुन, क्योंकि मन के सुकून में है तेरा सुकून!! !! मन सुकून, तो सब सुकून !! ********************

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