तेरी मेरी बात !
क्या तू जानता है ?
जिस इंसान को तूने बनाया,
वो आज तुझे ही मानने से इनकार करता है,
उसे बताता क्यूँ नहीं,
की तू उससे कितना प्यार करता है!!
क्या तू ये जानता है ??
वो रोज़ मन्दिरों में जाता है,
और मूरत पे शीष टिकाता है,
वो मस्जिदों में जा कर,
अल्लाह की पुकार लगाता है,
वो गुरुद्वारे में भी पहुँचता है,
गुरु ग्रंथ में तुझे वो खोजता है,
वो गिरजाघर भी जाता है,
ईसा मसीह में तुझे तलाशता है,
वो दर दर बेचारा भटकता है,
लेकिन तू नज़र नहीं आता है !
कोई पूजा-पाठ,
तो कोई नमाज़ अदा करता है,
कोई विनती,
तो कोई आस लगाए बैठा है,
हाँ, मैं जानता हूँ मालिक ...
तू सब कुछ सुनता और समझता है,
लेकिन फिर भी कुछ ना कहता है !!
लेकिन क्या तू ये जानता है ??
दिन रात वो तेरी मालाएँ जपता है,
और मंगल कामनाएँ करता है,
तेरे एक दर्शन मात्र को वो,
मीलों मील तक चलता है,
हो बदन में पीड़ा भले पर,
मन से ना वो थकता है !
कई गीत-गाथाएँ लिखता है,
तू बाज़ारों में भी बिकता है,
मिट्टी से लेकर सोने तक,
अनेक रूपों में दिखता है,
तू आसमाँ में भी विहीन है,
और धरती में भी बसता है,
कोई कण-कण में तुझको पाता है,
कोई हर क्षण भटकता रहता है,
तू ग़र चाहे तो सब है मुमकिन,
बिन चाहे ना पत्ता हिलता है !!
इतना ही नहीं मालिक...
कोई तुझे दूध और जल से नहलाता है,
कोई चादर की भेंट चढ़ाता है,
कोई पुष्प अर्पित करता है,
तो कोई मिष्ठान पकवान खिलाता है,
कोई ख़ाली हाथ गुजरता है,
और झोली भर भर जाता है,
कोई सब कुछ न्योछावर कर के भी,
कुछ भी ना अर्जित करता है,
मत पूछ बार बार मुझसे,
की इतना कहाँ से आता है,
सवाल तो मेरा ये है मालिक,
की आख़िर में कहाँ सब जाता है ??
अच्छा छोड़ ये सब, एक बात बता.....
तूने एक समान हर इंसान बनाया,
इंसान ने बाँटे धर्म और जात,
फिर ज़ोरों से प्रारम्भ हुआ,
ऊँच नीच का पक्षपात,
फिर ज़मीं का विभाजन हुआ,
और बटने लगे घर,
अब रंगों की बारी आयी,
कहाँ बच सका जानवर !
पत्थर को हैं ये पूजते,
आपस में द्वेष और फ़साद,
क्यूँ नहीं इन्हें तू समझाता,
कि मिलकर रहें सब साथ,
पूरी हो जाएँगी एक दिन,
हैं जितनी भी सबकी आस,
बस बढ़ता जा नेकी के पथ पर,
और रख मुझ पे विश्वास,
भूल चुका हर मानव यहाँ,
बस एक इतनी सी बात,
तेरे ही भेजे हम बंदे हैं,
लिखा अंत भी तेरे पास !!
मालिक, मैं भी तेरा सेवक हूँ,
बस इतनी है फ़रियाद,
ये इंसान तुझको है भूल रहा,
क्या तुझको नहीं हम याद ???
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~ shubh 🐰
